Tuesday, February 9, 2016

कहानी: बर्थ

कहानी :
बर्थ

अरे भाई कौन सा स्टेशन आ रहा है, आगरा कब आएगा, भाई, अरे छोडो सुनाई नहीं पडता इसको शायद, कान में डटटक लगाए हुए है। अंकल आप को आईडिया है कौन सा स्टेशन आ रहा है। शायद आगरा, क्योंकि पिछला स्टेशन फरीदाबाद था जिससे चले हुए चार घंटे से ऊपर हो गए है।
आगरा....अभी आगरा ही पहुंचे है, अचानक शरद के मुंह से निकला। वही शरद जो कान में हैडफोन लगाए गाना सुन रहा था। उसे किसी से बात करना पसंद नहीं, खासकर ट्रेन में इन लुंज पुंज से लोगों से जो मुंह में गुटका दबाए रखते हो और हर स्टेशन में कूदकर पूडी भाजी और पकोडी खाते हो। कितने अनहाईजनिक लोग होते है।

आगरा पहुंच रहे है सात बजे, मतलब ट्रेन एक घंटा लेट है। अभी एक घंटा, त्रिवेंद्रम जाते हुए तो कई दिन लेट हो जाएगी, अचानक उसे कोफ्त भरी हंसी आई। इस रेनू को भी अभी शादी करनी थी। वो भी त्रिवेंद्रम में, हद है, ऊपर से जून की गर्मी का सितम।  रेनू, शरद की मौसेरी बहन है। सबसे ज्यादा लगाव भी है और मानता भी बहुत है। रेनू भी फोन पर शरद भैया, मैं आ रही हूं कहती हुई हर छुटिटयों में लुधियाना पहुंच जाती। और फिर उधम, कभी शॉपिंग, कभी फिल्म देखना, हर सुबह यूनिवर्सिटी के मैदान में सैर के लिए जाना। शरद की बीवी नेहा भी रेनू को अपनी असली ननद ही मानती। वैसे शरद की अपनी बहन भी है पर शादी के बाद वह कनाडा ही सैटल हो गई है, बातचीत भी कभी स्काईप पर तो कभी सीधे आईएसडी कॉल। शरद के बच्चे बंटी और सोना भी रेनू बुआ के पीछे लगे रहते।

शरद की सोचने की रेलगाडी भागी चली जा थी। रेनू को भी शादी की ऐसी जल्दी थी कि त्रिवेंद्रम में ही कॉर्ट मैरिज कर ली और अब खबर भेज रही है कि भैया एक छोटा सो रिसेप्शन रखा है, प्लीज आ जाओ।परेशानी यह की नेहा के चाचा के लडके की शादी भी परसो भटिंडा में है। एक तरफ साले साहब, दूसरी तरफ बहन की शादी। तय हुआ कि नेहा बच्चो समेत भटिंडा जाएगी और मैं अकेला सैकेंड स्लीपर नॉन एसी से त्रिवेंद्रम। अरे दो दिन पहले एसी डब्बे में तो रिजर्वेशन मिलेगा नहीं। तत्काल में यह मिल गया, यही गनीमत है।

पर गर्मी का क्या करें। अभी आगरा से ही गाडी निकली। सुबह पांच बजे का चला हुआ, दिन भर गर्मी, धूल, बदबू और शाम सात बजे तक सिर्फ आगरा। टाईमटेबल के हिसाब से गाडी परसो शाम को 6 बजे त्रिवेंद्रम पहुंचेगी, अगर लेट ना हो। पर यह तो अभी से ही....ए भाई जरा पैर उधर करना, एक सूटकेस रखना है। शरद का गुस्सा फट पडा, क्यों रखना है, मेरी सीट है, मैं लेटा हुआ हूं। शरद को ललकारते हुए पहलवाल नुमा शख्स ने कहा, क्यों बे तेरे बाप की ट्रेन है। टिकट लेकर पूरे कंपार्टमेंट में लेटेगा क्या। शरद ने कुनमुना होकर सूटकेस को जगह देने के लिए पैर समेट लिए। कितनी बार उसने अखबार में पढा था कि सहयात्रियों में झगडा हुआ और एक को ट्रेन से नीचे फैंक दिया। नहीं, ऐसे ही ठीक है। उसने फिर से कानों में हैडफोन लगा दिए।

हाथ में पाउलो कोहलो की किताब, कान में हैडफोन, पर शरद तो सोचे ही जा रहा था। कितना खुश था जब उसको लुधियाना में एक बडे निजी बैंक में मेनेजर की नौकरी लगी। पूरे दो साल हो गए थे एमबीए की हुए। एमबीए नहीं एमबीए फिनांस वो भी जालंधर की सबसे बडी निजी यूनिवर्सिटी से। पूरे 6 लाख खर्च हुए थे। पर नौकरी मिल रही पांच हजार महीना, ज्यादा से ज्यादा 8 हजार महीना। एमबीए फिनांस सिर्फ आठ हजार महीना, करनी पडी क्योंकि एजुकेशन लोन की किश्ते शुरू हो गई थी। पिताजी भी इतना भर कमाते की पांच लोगों का परिवार चल सके। पिताजी, माताजी, दादी, शरद और छोटी बहन। शादी नहीं हुई। पर लुधियाना में नौकरी मिलने के एक साल में ही उसकी शादी तय हो गई। समय कितनी तेजी से गुजरता है,दस साल हो गए लुधियाना गए हुए। या यूं कहे 10 साल हो गए बादशाहपुर छोडे। अब रोज रोज तो वहां नहीं जाया जाता, पहले तो फिर भी महीने दो महीने में एक बार पर जबसे बंटी और सोना हुए तब तो साल में एक बार ही मां बाउजी के दर्शन हो पाते है। अचानक एक झटके से पूरी बोगी हिली। अरे क्या हुआ, खिडकी से चिल्लाते हुए उसी पहलवान ने पूछा। हां, जैसे बाहर कोई उसको जवाब देने के लिए बैठा है। करीब आधा घंटा रूकने के बाद ट्रेन दुबारा चलनी शुरू होती है। अरे क्या हुआ भाई, तभी दूर की सीट से आवाज आई, अरे कोई ट्रेन के नीचे आ गया था।

पर शरद इस घटनक्रम से परे अपनी ही सोच में डूबा था। लुधियाना वाले घर में कोई भी अपना नहीं आता। हां कभी कभी रेनू आ जाती। रेनू और शरद की सभी भाई बहनों में सबसे अच्छी पटती थी। सात मौसरे भाई बहन। सब छुटिटयों में इकटठा होते और खूब हुडदंग मचाते। पर रेनू के आते ही पल्टन में जान आ जाती। रेनू भी शरद को अपनी सारी बाते शेयर करती। बताती कि उसका कोई बॉयफ्रेंड है पर मम्मी पापा उसका आना पसंद नहीं करते। कॉलेज का दोस्त है। शादी करना चाहते है पर पापा तैयार नहीं होगें क्योंकि वो मलयाली है। इतनी जल्दी शादी का भी सोच लिया, सोचा क्या, कर भी ली, बताया भी नहीं, अब रिसेप्शन में बुला रही है। मलयाली है तभी त्रिवेंद्रम में शादी....सोचने का क्रम चलता रहता अगर कुली और चाय्य चाय्य की आवाज से तंद्रा भंग नहीं होती। झांसी, हां यही लिखा था सामने रेल के खंबे में। भूख लग रही थी। सुबह पांच बजे का निकला सिर्फ दो परांठे खाये थे, दिन में खाने का मन नहीं हुआ। टाईमटेबल देखा, झांसी में 10 मिनट रूकती है ट्रेन। चलो उतर कर कुछ खाने को देखा जाए। एक ठेले पर रेलवे का जनता खाना, चार सूखी पूडी और तरीदार आलू। दूसरे ठेले में बासी ब्रेडपकोडे और समोसे। सामने रेलवे की कैंटीन, वही पूडी सब्जी, सैंडविच, ऑमलेट। भूख में इच्छाएं मर जाती है। अरे भाई एक पूरी सब्जी, एक माजा, एक बिसलेरी और एक चिप्स का पैकेट देना। अरे पूरी कब की तली है, हां तुम तो कहोगे ही कि अभी 10 मिनट पहले तली थी। दुकानदार ने कोफ्त भरी नजरो से कहा 95 रूपये, और हाथ में एक डब्बा और चिप्स, ठंडा और पानी पकडा दिया। जल्दी से पैकेट संभालकर वापस गाडी में बैठ गए। ठंडी पूरी और आलू इस वक्त इतना स्वाद दे रहे थे जैसे वह उसका मनपसंद व्यंजन हो। गाडी प्लेटफॉर्म से सरक रही थी। सामने वाली सीट पर एक बच्चा कातर निगाह से उसको खाते हुए देख रहा था। शरद ने भी भोलेपन से पूछा, बेटा पूरी खाओगे, उसके हां ना से पहले उसकी मां बरस पडी। रहने दो भैया, अभी इसने खाया है। क्या बाबू कितनी बार समझाया है कि अंजान लोगो का कुछ नहीं खाते। खुनमुनाते हुए बच्चे ने अपनी मां को देखा और भुनभुनाते हुए शरद सीट की दूसरी तरह मंुह करके बैठ गया। मन में विचार आया कि नेहा ने अब तक खा लिया होगा, फिर याद आया कि अरे वो तो कजिन की शादी में गई है, मजे कर रही होगी। और यहां मैं गर्मी में सडी पूरियां खा रहा हूं। 

परसों त्रिवेंद्रम, एक दिन रूक के शुक्रवार को वापसी की ट्रेन। इतवार की रात को वापस घर। खाया पिया कुछ नहीं, गिलास तोडा बारह आना, मतलब साला इतनी दूर जाओ और एक दिन रूक कर वापस। पूरे टूर का खर्चा सब मिलाकर 20 हजार जिसमें रेनू के कपडे और कुछ गिफ्ट शामिल है। एक सोने का सेट भी खरीदा अलग से, बहन है, अभी नहीं दूंगा तो कब दूंगा। रेनू तो कह रही थी कि भैया खर्चा मत करना, बस एक साडी गिफ्ट करना, अरे ऐसे अच्छा थोडे ही लगता है। रेनू को हमेशा मेरे खर्चे की चिंता रहती थी। जब मैं एमबीए कर रहा था तो वह मुझे कभी मोबाईल भेज देती, एक बार तो लैपटॉप ही दे दिया। मैंने मना किया तो कहा कि अगर मौसाजी देते तो मना करते, समझो उन्होने ही दिया। उसी लैपटॉप में प्रेजेंटेशन बना बना कर, पूरी क्लास में बेस्ट प्रेजेंटेशन मेकर का इनाम जीता था। एक बार पता नहीं कहां से रेनू को पता चला कि मैनें पिताजी से किताबें खरीदने के लिए 5 हजार रूपये मांगें है। उसने पिताजी के नाम से मुझे 6 हजार का मनीऑर्डर भिजवा दिया।जब सच्चाई पता चली तो उसने कहा कि भाई को ही तो दिया है, कोई अहसान थोडे ही किया है। जब नौकरी लग जाएगी तब वापस कर देना। तो क्या उसकी शादी में सोने का सेट देना गलत है, अब बीवी क्या समझे इस रिश्ते को। सोचते सोचते शरद के खर्राटे पूरे कंपार्टमेंट में गूंजने लगे।

हां भई टिकट, कहां है तेरा टिकट, यह तो गलत डब्बा है भाई, तेरा टिकट तो एस2 का है और यह एस 5 बोगी है। शोर सुनकर शरद की आंख खुल गई। घडी में सुबह के चार बज रहे थे। सामने प्लेटफॉर्म के बोर्ड में इटारसी लिखा हुआ था।  क्या मुसीबत है, ना सोने देते है, और उफ यह गर्मीमुंह फेरकर शरद फिर सोने की कोशिश करने लगा। हा हा हा जोर जोर से ठहाके और बातों का शोर, आंख पलटकर देखा कि सामने वाले बर्थ में कोई परिवार इसी स्टेशन से बैठा है। अरे यार सोने दो, शरद ने भरराते हुए कहाहां हां ठीक है ठीक है। अरे चंदा चादर ढंग से बिछा। अरे यह सूटकेस यहां क्यों रखा। शरद ने फिर गर्दन उठा कर देखा पर सामने वाले तो बेपरवाह अपने में ही तल्लीन थे। अरे भाई यह ट्रेन थी कोई रिश्ते तो थे नहीं जिसमें एक दूसरे का ख्याल रखा जाए। जब शरद ने पहली बार रेनू को बताया कि उसका रिश्ता तय हो गया है तो लगा कि रेनू तो बस मोबाईल फाड कर अभी आ जाएगी। क्या नाम है भाभी का, कहां कि रहने वाली है, कब मिलने ले जा रहे हो। अरे बस कर रेनू, उनका नाम नेहा है, यही जलंधर की है। और रेनू को छेडने का मौका मिल गया। उनका नामउनका क्या बात भैया, इतना शर्माना भी ठीक नहीं। ऐसा करते है, मैं अगले हफ्ते आती हूं और भाभी से उनके घर पर मिलती है। तुम्हे आना है तो आओ नहीं तो सिर्फ पता बता दो। और वो सच में नेहा से मिलने अगले हफ्ते जालंधर पहुंच गई। जब बंटी हुआ तो ना जाने क्या क्या उठा कर ले आई, वॉकर, खिलौने, कपडे, चांदी के कडे, सोने की छोटी चेन। मना करने पर रूआंसी होकर बोली, ठीक है भाई अगर मैं बुआ होकर अपने भांजे को कुछ नहीं दे सकती तो मैं यहां से जा रही हूं। और सच में उसने अपना सूटकेस उठा लिया। मान मनौव्वत करने के बाद सूटकेस जमीन पर उतारा। 

अरे ये सूटकेस किसका है, चलने की भी जगह नहीं, किसी के चीखने की आवाज आई। शरद आधी तंद्रा से उठा कि कहीं उसका सूटकेस तो नहीं। अरे सच में उसी का सूटकेस, पर वो तो सीट के नीचे था, तो यह इतना किनारे कैसे पहंुचा। साइड अपर में सफेद कुर्ते पजामें में लेटा एक पान चबउव्वा बोला, भाईसाहब सूटकेस को चेन से बांधकर रखो, कहीं कोई उडा के ना ले जाए। अरे यही शब्द तो रेनू ने नेहा से कहा था कि मेरे भाई को अब चेन से बांधकर रखना, इतना हैंडसम और स्मार्ट है कि पता चले किसी और लडकी का दिल इन पर आ जाए और इनको उडा कर ले जाए। शरद हंस दिया। अरे अजीब आदमी है, एक तो सलाह दो और उपर से यह साहब हंस रहे है, पान चबउव्वा ने खीजते हुए कहा। शरद ने गंभीर होते हुए कहा कि सॉरी, मैं कुछ और ही सोच रहा था।

अरे कौन सा स्टेशन आ रहा है। पान चबउव्वे ने कहा कि नागपुर निकल चुका है अब तो छोटे मोटे स्टेशन ही आएगें, बडा तो अब सीधे वारांगल फिर विजयवाडा है। कहां जा रहे है, शरद ने कहा त्रिवेंद्रम, और आप। कुर्ता छटकते हुए बडे ही स्टाईल में कहा कि कोयंबटूर, वहां मेरा साला रहता है। एक हफ्ते वहीं आराम करूंगा, फिर उसे कहूंगा कि रामेश्वर घुमा के ला। घूमने का बहुत शौक है मुझे। वह बोलते जा रहा था पर शरद का ध्यान कहीं और था। घूमने का शौक तो रेनू को भी है। तभी तो ग्रेज्युएशन शिमला से, पोस्ट ग्रेज्यूएशन इलाहाबाद से, नौकरी करी चैन्नई में फिर वहां से हैदराबाद, बैंग्लौर और अब त्रिवेंद्रम। घर में तो कदम ही नहीं पडते, जब भी लुधियाना आती, एक मिनट भी नहीं टिकती। भाभी यहां घुमाओ, चल बंटी गोलगप्पे खा कर आते है। एक दिन तो बंटी और सोना को बाजार ले गई। सोना तब 2 साल की रही होगी। पहले गोलगप्पे खाये, फिर जूस पिया, फिर मोमोज खाए, फिर ऑमलेट खाया। रात होते होते सोना को उल्टियां शुरू। रेनू तो देखकर रोने लगी। नेहा ने ही समझाया कि अरे रो क्यों रही है, ज्यादा खाने से अपच हो गई है सुबह तक ठीक हो जाएगी।

स्टेशन पर स्टेशन आ रहे थे, पर मंजिल अभी भी दूर थी। कब त्रिवेंद्रम आएगा, रेनू ने क्या नाम बताया था अपने पति का, बस आखिर का श्रीवत्सा ही याद है। जो भी हो, कैस होगा, फोटो दिखाई थी रेनू ने, पर शक्ल याद नहीं। वैसे भी ज्यादातर दक्षिणी धोती पहनते है। पता नहीं रेनू वहां खप पाएगी। अरे उसको वहां थोडे ही रहना है। रेनू ने ही बताया था कि श्रीवत्सा अपना ट्रांसफर मुंबई ले रहा है। अच्छा ऑफर है। रेनू भी वहीं नौकरी देख लेगी। बहुत तेज है, घर संभाल ही लेगी वो। 

शादी के बाद वो रेनू और उसके पति को लुधियाना आने के लिए कहेगा। छोटा घर है, पर रेनू का दिल बडा है, वो अपने श्रीवत्सा को भी समझा देगी। अब शादी तो कोर्ट में कर ली है नहीं तो पूरा प्लान था कि रेनू की शादी का आधा खर्च वहीं उठाएगा। आखिर रेनू ने भी तो उसके खर्चे उठाए थे। कोई बात नहीं, अभी तो बहुत मौके आएगें, लेने देने के, तब कसर पूरी कर दूंगा। वैसे जो सोने का सेट ला जा रहा हूं वो भी 60 हजार का है। मन तो कर रहा था की कंगन और एक चेन भी ले लूं पर सुनार कोई सगे वाला तो है नहीं। जितना बैंक में जमा था, 10 हजार छोड कर सब खर्च कर दिया। ठीक है 20 दिन गुजारा कर लेगें इनमें, अब रेनू की शादी है किसी और की थोडे ही है।

रेल अपनी पूरी रफ्तार से चल रही है, शरद की यादो की रेल भी। दोनो को त्रिवेंद्रम पहुंचने की जल्दी है, रेनू से मिलने की जल्दी है।
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- प्रतिमान उनियाल        

कहानी: रवानगी

कहानी
रवानगी

आज विभाग में सुबह से गहमागहमी थी। ज्यादा बडा विभाग नहीं है। मात्र 7 लोग काम करते है रमेश जी को मिलाकर। और आज रमेश जी का इस दफ्तर में आखरी दिन है। नहीं नहीं रिटायर नहीं बल्कि अपने भविष्य को नया रंग देने के लिए सम्मानीय तरीके से इस्तीफा दिया था। भविष्य को नया रंग देना क्या होता है और क्यों कोई दस साल के बाद अचानक इस्तीफा देदे, यह राज दफ्तर के किसी भी व्यक्ति को नहीं पता चल पाया। रमेश जी को विभाग में सब सम्मान से देखते है, चूंकि विभाग में बॉस के बाद वरिष्ठता में उनका ही नंबर आता है तो उनको सेकेंड इन कमांड का दर्जा भी मिला हुआ है।

ठीक 8:45 बजे रमेश जी धीमे पर सधे कदमों से अपना केबिन खोलते है। पीयन दौडता हुआ उनके पास आता है गुड मार्निंग सर। हमेशा की तरह आज भी रमेश जी सबसे पहले दफ्तर पहुंचा था। बाकी लोग 9:15 या 9:30 से पहले तो बिल्कुल नहीं पहुंचते हां बल्कि बॉस के हमख्याला और हमनिवाला जरूर 10 बजे तक पहुंच जाते। पर रमेश जी हमेशा कहता था कि समय से आओ और अगर काम खत्म हो गया है तो समय से घर जाओ। हमेशा अपने काम से प्यार करो, कंपनी से नहीं। परिवार ही जीवन भर साथ रहेगा, कंपनी हमेशा साथ तो ना देगी।

संजय, पीयन उनके पास आया, कहा, सर आज आप सच में जा रहे हो। हां भाई जा रहा हूं पर सिर्फ इस कंपनी से। मेरा घर तो तूने देखा ही, जब मन करे आ जाना। और जो नया काम में शुरू करने जा रहा हूं, उसमें तेरी जरूरत पडेगी। पीयन की नहीं बल्कि एक अफसर की।  संजय की आंख में आंसू आ गए। तीन साल पहले की बात थी। संजय को पीयन के रूप में काम करते हुए एक साल हो गया था। पर उसको दुनिया जहान की जानकारी होती। अनेक बार पर जब कोई सीट पर नहीं होता और फोन की घंटी बजती तो बिल्कुल पेशेवर तरीके से वो फोन पर बात करता और संदेश लिख लेता। कई बार जब बाहर से एग्जीक्यूटिव लेवल का कोई आता अपना सामान दिखाने के लिए, तो संजय हमेशा उस माल में मीन मेख निकालता और पैसे कम करने की बात करता। कभी कभी तो बॉस उसे कहती कि अखबारों से कंपनी की खबरे निकालो तो वह हिन्दी अंग्रजी अखबारों से अपनी कंपनी की खबरे निकालता, काटता और फाईल में चिपकाता। एक दिन रमेश जी ने कहा कि तू बीए क्यों नहीं कर लेता। कैसे करूं सर, 12 घंटे यहां काम फिर घर में पूरा परिवार। ना समय निकाल पाउंगा और ना ही फीस के पैसे हो पाएंगें। रमेश जी ने सलाह दी की पत्राचार से तो लगभग हर यूनिवर्सिटी बीए कराती है और उनकी फीस भी कम होती है। जोर डालने पर अगले हफ्ते संजय फॉर्म ले आया। रमेश जी ने अपने हाथों से उसका फॉर्म भरा और कहा फीस की कभी चिंता पर करना, मैं हूं ना।

दोे महीने पहले ही उसने सबको मिठाई खिलाई थी। उसका बीए पूरा हो गया था। एक चपरासी ग्रेज्यूएट हो गया, कुछ को यह बात हजम नहीं हो पा रही थी। पर रमेश जी सबसे ज्यादा खुश दिखे। एक महीना गुजरने के बाद रमेश जी ने संजय से पूछा कि बीए तो कर लिया अब एमए कर ले। संजय ने कहा कि सर मैं आपसे सलाह लेने ही वाला था कि एमए करूं या कुछ और। कुछ और क्या। सर एमबीए।क्या  एमबीए, पागल मत बन, नहीं हो पाएगा तुझसे और फीस भी तो हजारों में होगी। । संजय अपने बैग से एक ब्रोशर निकालकर लाया। सर यह निजी विश्वविद्यालय पत्राचार से एमबीए कराता है और क्लासेस सिर्फ शनिवार और इतवार। फीस तो देखिए हर सेमेस्टर में सिर्फ 7500 रूपये। रमेश जी ने कहा कि पर तेरा वेतन तो सिर्फ 7000 है फिर पूरा परिवार। अरे सर, संजय ने समझाते हुए कहा कि हजार बारह सौ हर महीने जमा करूंगा। सर परिवार को संभाल लूंगा। अगर कुछ करना ही है तो कुछ झेलना भी पडेगा। और सर ऐसा करो आज आप इनके सैंटर चलो। आप को ज्यादा आइडिया है। अगर आपको ठीक लगा तो एडमिशन ले लूंगा। रमेश जी ना केवल संजय के साथ सैंटर गए बल्कि उसका फॉर्म भी भरवा दिया साथ ही साथ एडमीशन और पहले सेमेस्टर की फीस भी तुरंत वहीं जमा करा दी। संजय को सिर्फ इतना कहा कि एमबीए बन के दिखा और बता दे इन ऑफिस वालों को कि चपरासी भी अफसर बन सकता है।

पता नहीं क्यों आज संजय कांपते हाथों से चाय लेकर रमेशजी के केबिन में दाखिल हुआ। सर मत जाओ। उसी वक्त अनिल दफ्तर में दाखिल हुआ। डील डौल के कारण वह विभाग का महाबली भीम है। पर आज अनिल की चाल भी सुस्त थी। रमेश जी का केबिन सबसे पहले पडता है। अनिल अंदर घुसा और सामने की कुर्सी में धंसते हुए बोला। सर पक्का जा रहे हो ना। प्लान तो नहीं बदलोगे। आखिर आपके बाद मैं ही संभालूंगा आपका केबिन। अनिल की आंख से आंसू टपाटप झर रहे थे। रमेश जी भी मुस्कुराते हुए बोले हां कमीने अब तू यहां पर राज करियो। राज। हां सर राज करने के दिन आ गए एक आप ही कांटा थे। बहुत गहरी दोस्ती है अनिल और रमेश जी की। अनिल के बडे भाई संजीव, रमेश जी के कॉलेज के जमाने के दोस्त है और आज भी संजीव और रमेश के परिवार वाले दोस्ती से ज्यादा रिश्तेदारों वाला व्यव्हार करते है। करीब नौ दस साल पहले जब दोनो की शादी नहीं हुई थी तो अमूमन रोज ही एक दूसरे के घर आया जाया करते थे। अब कहां इतनी फुर्सत। बहरहाल, एक दिन संजीव ने कहा कि उसका छोटा भाई किसी भी एंट्रेंस में निकल नहीं पा रहा है। कौन सा कोर्स करे की भविष्य में नौकरी मिल जाए। रमेश जी ने कहा कि जो कुछ नहीं कर पाते वह पत्रकारिता करते है। और इस तरह से अनिल का पत्रकारिता में प्रवेश हुआ। फिर अनिल ने छोटे मोटे अखबारों में काम किया पर आय ज्यादा नहीं होती और उसकी शादी करवाने के लिए परिवार का दबाव। संजीव को रमेश जी ने सलाह दी कि हमारा दफ्तर जनसंपर्क कार्यालय है और अनिल के पास पत्रकारिता का अनुभव भी है तो हमारे यहां ही नौकरी के लिए अपना बॉयोडेटा भेज दे। इस तरह अनिल का विभाग में प्रवेश हुआ। रमेश जी हमेशा अनिल को कहते थे कि तू मेरा छोटा भाई समान है इसलिए यहां चिंता मत करना। अनिल भी बहुत मान देता है रमेश जी को। रमेश जी दिल्ली में रहते और अनिल गाजियाबाद। इन दोनो की दोस्ती इस कदर घनघोर थी कि रोज शाम को एक साथ निकलते और कभी अनिल दिल्ली होते हुए गाजियाबाद जाते तो कभी रमेश जी गाजियाबाद होते हुए दिल्ली। अनिल को खाने का बहुत शौक है। दोनो के दोनो शाम को कभी किसी ढाबे में चाय ऑमलेट खाना, कभी किसी ठेले में लिटटी चोखा या कचौडी समोसे आदि।

अभी कुछ महीने पहले रमेश जी के पास उनके केबिन में अनिल आया और सर नीचे झुकाकर कहा कि सर बहुत दिनों से आपसे सलाह लेने की सोच रहा था। क्या हुआ। सर आपको पता है कि मैं भाई के साथ रहता हूं। उनका भी दो बच्चों का भरा पूरा परिवार है और अब मेरा बेटा बाबू भी बडा हो रहा है। कुछ महीनों में स्कूल जाना शुरू करेगा। अरे तो दिक्कत क्या है। सर मैं कुछ दिनों से घर ढूंढ रहा हूं। एक पसंद कर लिया है, दो कमरो का है। मतलब क्या कहना चाहते हो रमेश जी ने आंखों में आंख डालते हुए कहा। मैं भाईजान से अलग होना चाहता हूं। गुस्सा तो रमेश जी को इतना आया कि अगर दफ्तर ना होता तो एक झापड रसीद कर देते। । पर इतना ही कहा कि अब बच्चा इतना बडा हो गया कि अपने मां बाप से अलग होना चाहता है। तुम्हारे मां पिताजी तो गांव में रहते है पर यहां किसने तेरे को बाप की तरह पाल। भूल गया कि तेरी भाभी तेरे को अपने बेटे जितना प्यार करती है। हां सर आप ठीक कह रहे है पर एक पौधा तभी पनप सकता है जब वह पेड से थोडा दूर रहे। अभी तक मैं पेड पर निर्भर था पर अब मेरा परिवार मुझ पर निर्भर है। आज नहीं तो कल यह दिन आएगा सर। रमेश जी ने पूछा संजीव को मालूम है। ना हिम्मत नहीं हो रही। रमेश जी ने पलटवार किया मतलब जिस पेड से अलग होना चाहते हो उसी को नहीं मालूम। सर प्लीज आप ही भाईजान से बात करे। रमेश जी ने कहा कि देख अनिल मेरा उसूल है कि मैं पारिवारिक मामलों में नहीं पडता। अगर तुम मेरे छोटे भाई तो वो भी मेरा दोस्त है। अरे तुम्हे ना लगे या संजीव को ना लगे पर पूरा जमाने को तो यही लगेगा कि एक दोस्त ने दूसरे दोस्त का परिवार तोड दिया। ना तुम्हे ही हिम्मत करके बात करनी होगी।ठीक सर मैं बात करूंगा। जब बेटा अलग होता है तो जिस तरह पिता अपने दुख को छुपा कर बेटे की मंगलकामना करते हुए स्वीकृति देता है वैसे ही संजीव भी मान गया। अच्छी बात यह हुई कि दोनो भाईयों का परिवार रोज ही एक दूसरे के घर जाते है और रमेश जी को भी दो घरों का व्यंजन चखने का मौका मिल जाता।

अरे कहां जा रहा है, रूक चाय यही पी ले। नहीं सर मैं अपनी सीट पर ही चाय पीउंगा। बहुत काम है। हां कामचोर तेरे को भी काम है, रमेश जी ने आंख मारते हुए कहा। उसके आंसूं थम नहीं रहे थे और कांपते हाथों से चाय को छलकाते हुए अपनी सीट पर सिर नीचे कर बैठ गया।

तभी धडधडाते हुए दिनेश दाखिल हुआ। सर कैसे हो, अरे अनिल को क्या हुआ। ओह अरे आज तो आपअरे सर एक बार बोलो ना। एचआर से कहकर आपका इस्तीफा रूकवा देते है। बॉस भी यही कह रहे थे कि उसे बोलो इस्तीफा वापस लेले। दिनेश भाई अगर बॉस सीधे मुझसे कहती तो सोच सकता था। पर छोडो भी नहीं जा पाया तो फिर कभी हिम्मत नहीं दिखा पाउंगा। रमेश दिनेश अनिल को पूरा ऑफिस त्रिदेव कहता। कुछ लोग थ्री मस्कीटियरस भी कहते। जोडी है ही इतनी बेजोड। तीनों के तीनों अगर पहिए है तो एक दूसरे के लिए स्टेपनी भी है मतलब तीनों एक। अनिल से पहले रमेश और दिनेश की जोडी एसे ही थी बेजोड। दिनेश ने रमेश से कुछ महीने पहले दफ्तर ज्वाईन किया था। दस साल कैसे बीत गए। रमेश की शादी दिल्ली से दूर उनके अपने शहर में हुई थी। दिनेश ना सिर्फ खुद आया बल्कि शादी की पूरी फोटोग्रफी और विडियोग्राफी का जिम्मा भी खुद लिया और फोटोग्राफर को लेकर भी आया।  शुरू के कुछ साल तो रमेश, दिनेश के साथ उनकी मोटरसाईकल में आते थे। पर रमेश जी महीने में एक या दो बार मोटरसाईकल में टंकी फुल के पैस देते। फिर बाद में रमेशजी ने कैब करवा दी थी। पर जब भी शाम को ऑफिस से निकलते हुए देर हो जाती तो बेधडक दिनेश की बाईक में बैठ जाते।

यादों की शो रील में तब खलल पडा जब बॉस की आवाज आई। खैर आज रमेश जी के पास कोई काम नहीं था। अपनी जिम्मेदारियों को बाकी लोगों में बांट दी थी। तो सोचा डेस्क और ड्राअर का अपना सामान ही अलग कर लिया जाए। डेस्क में अपना क्या होता। कंप्यूटर, फाईलें, टेलीफोन सब ऑफिस का था। बस एक डायरी थी पर उसमें भी ऑफिशीयर जानकारियां थी। मतलब अब डेस्क बेगाना हो गया। ड्राअर भरा पूरा था। बहुत कुछ।  । पहली नजर एक फोटो पर पडी, ग्रुप फोटो, जब कंपनी के प्रोग्राम से सब लोग जयपुर गए थे। शायद 8 साल पुरानी बात थी, अनिल से पहले, वहां कंपनी की जयपुर ब्रांच का वार्षिकोत्सव था। सुबह सब लोग ‍- तब थे ही कितने, चार ‍- जयपुर के लिए निकले। रास्ते भर गाने गाते हुए, शोर मचाते हुए। ऐसा लग रहा था मानो दफ्तर के अफसर नहीं, स्कूल ‍- कॉलेज के बच्चे जा रहे हो। मानेसर, नीमराणा, नीम का थाना, ना जाने कहां कहां गाडी रूकवा रूकवा कर खाने की फरमाईश करना, ऊंट दिखते ही गाडी रूकवाकर उसकी सवारी करना, चलती गाडी से बाहर की फोटो खींचना।  समारोह खत्म होने के बाद जयपुर घूमना और शॉपिंग करना। साडी की दुकान में रमेश और दिनेश खरीददारी करने के लिए पहुंचे। मोलभाव पुरूषों के रगो में तो बहता नहीं है, तो जो दुकानदार ने भाव लगाए उसी पर कार्ड से भुगतान कर दिया। निकल ही रहे थे कि बॉस आ पहुंंची, साडियां देखी, कितने की ली। क्या 5 हजार। अरे दिमाग खराब है क्या। और आव ना देखा ताव दुकानदार से भिड गई। लडके समझ के लूटोगे क्या। । इस तरह की साडी अभी बीस मिनट पहले मै 800 में लेगई। यह वाली 1200 सौ में। ऐसा करते करते सभी साडियों के दाम बताए। वहां ग्राहकों का भी मजमा लग गया। अरे लूट मचा रखी है। अरे पैसे वापस करो। पूरे 2 हजार । दुकानदार बोला अरे मैडम इन्होने कार्ड से भुगतान किया है। तो मैं क्या करूं, तुम्हे पैसे मिल गए तो बाकी वापस करो। नहीं मैडम। ठीक में अभी पुलिस को फोन करती हूं। और सच में फोन मिला दिया। दुकानदार की हवा खराब। बोला अरे मैडम मैं कर रहा हूं पैसे वापस। लो भाई 2 हजार, जाओ भाई। दिनेश ने बॉस से पूछा कि अब पुलिस ने कॉल बैक कर दिया तो। बॉस ने आंखें झपकाते हुए कहा कि मैनें तो ड्राईवर को मिलाया था ताकि कार लेकर इधर ही आ जाए। मुझे जयपुर थाने का नंबर थोडे ही मालूम है।

बरबस हंसी फूट पडी, अरे दूसरा फोटो बॉस और उनका। हां तब कंपनी के मालिक के बेटे की शादी हुई थी। बॉस को फोटो खिंचवाने का बहुत शौक रहा है। अरे यह फोटो दिवाली वाली, यह होली से पहले। ना जाने कितनी ही फोटो ड्राअर ने अपने में समेटे हुई थी जिसमें हर के साथ यादें लिपटी हुई थी। सोचा बैग में रखूं ना रखंू पर फिर रख ही लिया। अरे यह क्या एक रॉलर कंघा। अनिल हर सुबह सबसे पहले आकर इसी रॉलर कंघे से अपने मैगी जैसे बाल बनाता और यह जरूर कहता कि इसकी सुइंयां इतनी तेज है कि आप पक्का गंजे हो जाओगे। सर पर सच में रमेश जी के बाल कम हो रहे थे। पर रॉलर कंघे से नहीं बल्कि वंशानुगत।

लंच का समय हो गया था। रमेश ने दफ्तर के ऑवन से खाना निकाला और दिनेश के डेस्क की तरफ बढ गया। यह एक पुराना अलिखित नियम था कि खाना सब एक साथ दिनेश के डेस्क पर ही खाते थे। चाहे कोई नया हो या पुराना सब एक साथ।  यह भी एक नियम सा बन गया था कि दिनेश अपना डिब्बा खोलते, बुदबुदाते और अपने घर फोन करके बोलते, क्या बेकार खाना बनाया है या इसमें नमक तो है ही नहीं। उनको और बाकियों को रमेश जी के घर के बने भरवां करेले बहुत पसंद थे और रमेश को दिनेश के घर की लाल मिर्च लहसुन की चटनी। आज भी रमेश भरवां करेले लाए थे पर किसी का भी आज खाने का मन नहीं था। तभी एचआर से पीयन आया कि और रमेश से कहा कि सर आपके कागज तैयार हो गए है, आपको बुलाया है। मतलब विदाई का समय आ गया। यार मैं पहले खाना तो खा लूं। सब लोग बहाना बनाकर अपने सीट पर बैठ गए पर खाना किसी ने नहीं खाया। आज पहली बार अकेले खा रहे थे रमेश जी। एक रोटी खाकर डिब्बा बंद कर दिया और अपने केबिन को बंद करके सामान अपने बैग में रखने लगे। अपना बरसों पुराना बैग और अपनी चिरपिरचित मुस्कान ओढे बॉस के कमरे में गये और हमेशा की तरह कहा राईट मैडम अब जाने की परमिशन दीजिए। आज कॉन्टेक्ट की बजाए चश्मा लगा रखा था उन्होने। बॉस ने बिना निगाह ऊपर उठाए कहा ठीक है, ऑल द बेस्ट। लगा कि उनके चश्में के नीचें से कुछ बूंदे ढलक रही है। शायद मन का वहम था। केबिन से बाहर आकर सबके गले मिले। अनिल तेरा पीछा नहीं छोडूंगा साले अब तेरे घर आउंगा। आ जाना सर आपका ही है। दिनेश ने भी कहा कि मिलते रहना। बाकी लोग भी गले मिले। संजय पता नहीं कहां चला गया था। भागा भागा अंदर दाखिल हुआ। कुछ छुपाते हुए संजना, प्रकृति और मुस्कान को पकडा दिया। रमेश हमेशा से संजना को अपनी छोटी बहन समान माना। जब भी कोई परेशानी होती तो अधकचरी पंजाबी में कहते तुस्सी चिंता ना करो, त्वाडा वीर इत्थे ही है। प्रकृति को आए हुए अभी महीना ही हुआ था पर रमेश सबसे कहते इस लडकी में सीखने की लगन है। आज जाते जाते भी संजना और अनिल को कहा कि देखो मैं जा रहा हूं पर प्रकृति उसकी कमी पूरी करेंगी बहुत होशियार है यह, समझो लेडी रमेश ही है। किसी भी रोते को हंसाने की क्षमता है रमेश में। किसी भी परिस्थिती में वह चुटकुले बोल सकते थे। उनके चुटकुले जिसको संजना हमेशा पीजे कहती है। आज भी उनके पीजे सुनकर सब के होंठों पर हंसी आ गई।

 संजना ने पैकेट खोलकर किताब निकाल कर उसमें कुछ लिखा। प्रकृति ने चॉकलेट निकालकर दी । रमेश जी के पसंद के लेखक की किताब जिसमें उन्होने लिखा था। एक बेहतरीन साथी को.... सदा यंू ही खुश रहना और ऐसे ही खुशियां बांटना.... और सबके नाम थे। 
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- प्रतिमान उनियाल


कविता: हसरत

हसरत

कल तक बारिश से तरबतर
बेपरवाह हम घूमा करते थे
आज अपने ही दडबे में दुबके
छाता ओढे दो बूंद पानी की हसरत
सीने में पाल रखे है

तल्ख इतने कि दूसरे की खुशी में रंज पालते  है
अपनी मुस्कुराहट न जाने कहां छोड आए है
हंसी का भी पैमाना बना दिया है अबतो
कहीं बेतकल्लुफी हमें बीमार ना कर दे

कश्मकश बरकरार है 
जो हुआ कहीं हम ही तो ना जिम्मेदार थे
बेवजह ही अपने गमों को ज़्ामाने की देन मान बैठे रहे
कुछ तो गलत हुआ ही होगा
आखिर चिंगारी भी तो माचिस मांगती है

खत्म भी करो इस दोज़्ाख भरे हालात को
क्या पता, शायद मुमकिन हो
पर बताएं भी तो कैसे बताएं
फासलों से अब नई उचाईंयां छू ली है

सूकून के दो पल ख्वाब हसीन रह गए
हम तो उन्ही पलों के समुन्दर में कहीं गए
दीदार हो ना हो फरक नहीं पडता
यादों के पन्ना हर ओर चस्पां कर गए 

माहौल ऐसा बन पडा
खुद ढोनी पड रही अपनी शख्सियत
ना तब कुछ कर पाएं 
ना अब कुछ कर पा रहे है 
कल तक बारिश से तरबतर
बेपरवाह हम घूमा करते थे
आज अपने ही दडबे में दुबके
छाता ओढे दो बूंद पानी की हसरत 
सीने में पाल रखे है।

- प्रतिमान उनियाल

कविता: आओ उत्सव मनाए

आओ उत्सव मनाए

आओ उत्सव मनाए
यादों का उत्सव मनाए।
जरूरी नहीं
सिर्फ लम्हों का उत्सव ही खुशी दे
कभी गमों की मिश्री भी जरूरी है।
साथ हो तो
पल वहीं ठहर जाता है
बायोस्कोप तो जाने के बाद शुरू होता है।
उत्सव तो जरिया है
दिल में बसे रहने का
नहीं तो कौन किसे कब तक याद रख पाता है
गम का उत्सव सबसे जरूरी
बांटना किसी और से नहीं पडता
अकेले ही लुत्फ आता है, इस खजाने के साथ

आओ उत्सव मनाए
इन नीरस अकेले पलों कां
देखना कोई जाम ना छलक जाए इन आंखों से
देंगें नहीं एक बूंद भी पूरा पी जाएगें इस हाले को
क्या अमृत क्या विष आज तो यही बस बाकी है।
मदहोशी से कम कुछ गवारा नही
आज तो जी रमाने का दिन आया है

आओ उत्सव मनाए
इस तरह की फिर जरूरत न दिखे
खो जाएं ऐसे कि फिर ढूंढने से ना मिले
हसरतें दिल की पूरी कुछ ऐसे करें
रश्क हो दुनिया को कि वो साथ हमारे क्यों ना थे।

आओ उत्सव मनाए
मेरी दीवानगी का जिसका कोई मुकाम नहीं
आओ उत्सव मनाए
मेरी जहालत का जिसका कोई छोर नहीं 

- प्रतिमान उनियाल

कविता: सरसराहट

सरसराहट

आज फिर कहीं से हवा सरसरा के चल रही है
आज फिर बारिश के छींटे मन को भिगो रहे है
आज फिर तुझे ढूंढने को जी कर रहा है
पर कहां किससे पूछंू
अलग हुए तो न मिलने का वचन लिया था
इस बात को भी कई साल बीत गए
अब तो जिंदगी फिर से पिरो कर जी रहे है

कमी नहीं किसी चीज की
दुनिया को खुश करते हुए खुश हो रहे है
जज्बात की अब कोई जगह नहीं
उसको तो वहीं छोड दिया था जब अलग हुए थे
ठसक सिर्फ इस बात की है कि तुम्हारी खुशी नहीं देख पाया
दुनिया तो तुम्हारी भी खुशहाल कहीं दूर बसी होगी
इस बात की खबर मेरे अलावा शायद सब को होगी

दुख इस बात का नहीं तू साथ नहीं
परेशान सिर्फ इसलिए हूं तेरी कोई खबर नहीं
डाकिए मेरे सभी छुट्टी पर है या उनकी भी दुनिया बदल गई
चलो कोई नहीं इस तेजी से छोटी होती दुनिया में
कहीं किसी कोने में तेरा पता दिख ही जाएगा
दरवाजा छूकर वापस आ जाउंगा इस तसल्ली से
कि तुम भी मेरी तरह अपनी दुनिया में खुश हो

- प्रतिमान उनियाल

कविता: बारिश की कहानी

बारिश की कहानी

हर बारिश अपने में एक कहानी है
किसान के लिए सूखे में वरदान तो बाढ में तबाही है
शहर में ट्रेफिक तो स्कूल में छुट्टी की किलकारी है
प्रेमियों के अरमानों को फिर भिगोने की फरमानी है

चाहो तो स्वागत करके तन मन भिगो डाले
नहीं तो कहीं दुबक कर या भीगने के डर से
अपने को कहीं छुपा डालें
या अपनी यादों के दर्पण में फिर वही मंजर दोहरा डाले

बारिश में भीगने वाले से जरा पूछो कि उसका क्या कहना है
पानी से बचने के लिए उसने क्या क्या कर डाला है
कहीं छतरी उडी जाती है कहीं पैर पानी में छप्प से अंदर चला जाता है
कपडों को कीचड से बचाना भी अपने में एक लडाई है
तभी हर बारिश अपने में एक कहानी है

कभी उसके साथ रास्ते में चल दिए कि अचानक बारिश ने घेरा
पकड कर हाथ किसी दुकान की परछत्ती तले या पेड के नीचे
अपने को कम उनको भीगने से बचाना रहा ज्यादा जरूरी
पर मन में एक बात जरूर आती कि काश यह बारिश एसे ही बरसती रहे
तभी हर बारिश अपने में एक कहानी है

उसको घर तक छोडने का अरमान किया बारिश ने पूरा
हर जाने वाले रिक्शे को रोक उसमें बैठने की उनकी जल्दी मचाना
खुले रिक्शे में बैठकर दुपट्टे से अपने को ढांपकर पानी से बचाना
पानी का हर जुल्फ से बहकर चेहरे में जाकर मुझे भिगोना
तभी हर बारिश अपने में एक कहानी है

उसको घर की सीढियों तक छोड वापस आना
आकर घंटो तक बारिश को ताकना
हर एक पिछले पलों को याद करना
गीले कपडो को बार बार छूकर देखना कि कहीं सूखे तो नही
तभी हर बारिश अपने में एक कहानी है

बारिश आज भी हो रही है
हाथ में चाय की प्याली पकड खिडकी से नजारे दिख रहे है
आज भी एक लडका लडकी उसी तरफ बारिश से बच रहे है
आज भी एक जोडा रिक्शे में बैठकर जा रहा है, दुपटटा हवा में लहरा रहा है
आज भी हर वो मंजर याद आ रहा है
तभी हर बारिश अपने में एक कहानी

- प्रतिमान उनियाल



कविता: तुम्हारी.... डायरी

तुम्हारी.... डायरी

मैं डायरी हूं
वही डायरी जिसमें तुम लिखते हो
अपनी हर बात मुझमें उतारते हो
तुम्हारी खुशी में मेरा हर पन्ना खुश
तुम्हारे गम में हर पन्ना आज तक आंसुओं में तर
तुम्हारा साथ रहा साल के हर दिन हर पल

पर उसके बाद क्या
नया साल नई डायरी
मुझे क्यों भुला दिया
ठीक मुझमें अब नहीं कोई पन्ना शेष
पर डायरी तो अब भी वहीं हूं
जिसमें कभी तुम अपना सब न्यौछावर कर देते थे
मेरे पन्ने अब पीले हो चले
पर लिखावट तो तुम्हारी वैसी ही स्याह चमक रही

कभी तो मुझे पलट कर देख लो
कई एसी बाते जो तुम्हारी थी अब मुझमें समाई है
कुछ पल जब केवल मैं और तुम थे
पूरी रात जब सिर्फ मैं तुम्हे सुनती अपने में समेटती
अब दूसरी आई तो मुझे भुला दिया
चलों भुला दिया पर उन पलों का क्या उन बातो का क्या
क्या उन्हें भी भुला दिया
कल को फिर कोई नई दिखेगी
तुम्हारी यह वाली भी पुरानी हो चलेगी
क्या उसका भी तुम परित्याग करोगे
क्या उसको भी मेरे आंसुओं से परिचय करवाओगे

समय तुम्हें भी पुराना कर देगा
तब कोई तुम्हार साथ न देगा
पुराने को कोई सहारा नहीं देता
तब तुम मुझे खोजना
अगर तब तक खाक में न मिली तो मुझे संवारकर पढना
तब मैं तुम्हारा साथ दूंगी जबतक तुम चाहो

-  प्रतिमान उनियाल